मंगलवार, 25 दिसंबर 2007

धामू के दोहे

शब्दों पर पकड़ नही,
नही लेखनी में धार,
ख़बरों की खबर नही,
बन बैठे पत्रकार।

पढ़ते-wadhte कुछ नहीं,
लिखना उनका काम।
ऐसी पत्रकारिता हो रही,
जाने कहाँ मुकाम?

हाथ men दो-दो मोबाइल,
कान में लगी मशीन।
बांचे नही खुद का लिखा,
दूजे करें छानबीन।

दिखते भारी-भरकम लगेज,
मांगते वैसा ही पैकेज।
टिकते भी ज्यादा नही,
सधाएं औरों का मगज।

लिखे कोई, सुधारे कोई,
निखरे कोई और ही।
असल को पूछे न कोई,
नकली की वाहवाही.





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